Swati Yadav - End-term Assignment


2.Fiction: Using 2000 to 2500 words, write a short-story in which there is a substantial co-presence of English along with one or more non-English languages. In case these non-English languages happen to be other than Hindi (in Devanagri or Roman script), Urdu (in Nastaliq or Roman script) or Punjabi (in Roman script), do provide the translation of the non-English passages as footnotes.




                                                                         UPMA

मुझे कल अपने घर जाना है। हालांकि मेरा घर जाने का मन तो बिल्कुल नहीं है। घर  इसलिए जाना है क्योंकि Ye semester खत्म हो गया है। हर समेस्टर के बाद हमें कुछ दिन का ऑफ दिया जाता है।  कॉलेज की स्टार्टिंग के दिनों में तो घर लौटने की बहुत जल्दी हुआ करती थी। पर आजकल कुछ खास मन नहीं करता। पता नहीं अब घर पर मन नहीं लगता या कॉलेज में ज्यादा मन लगने लगा है। कारण जानने में कोई ज्यादा दिलचस्पी नहीं है मेरी। हां पर अब जाना तो पड़ेगा। ऐसा नहीं है कि मैं बदल गई हूं। ऐसा भी नहीं है कि घर पर कुछ बदल गया ह। पर हां कुछ तो जरूर  बदला ह। मेरा एक भाई है। एक भाई और था, जो अब नहीं है। Maybe is the reason that I don't want to go back home as often as I wanted to the before. बस अब प्यार महसूस नहीं होता।

Hi. कैसी हो? हैप्पी दिवाली।

मैं अच्छी हूं। तुम सुनाओ? सोए नहीं अभी तक?

Nahi I was waiting for you to wake up.

मेरी सुबह आजकल हर रोज ISI text से होने लगी है। हालांकि हर दिन दिवाली नहीं होती। कितना अच्छा लगता है ना जब कोई आपकी हर चीज का ख्याल रखे। आपके बोलने से पहले यह वह चीज आपको मिल जाए और आप भी उस शख्स के लिए कुछ ऐसा ही करना चाहे। यह बात मुझे धीरे धीरे समझ आने लगी है कि मांग कर मिली हुई चीज मैं वह खुशी नहीं है, जो खुशी इंसान को बिना मांगी हुई चीज में मिलती है।  मैं नहीं जानती पर हां आजकल खुद से यह ज़रुर पूछने लगी हूं कि क्या मेरे पापा मुझसे सिर्फ इसलिए प्यार करते हैं या फिर मेरे लिए सोचते हैं, just because he is my father? क्या वह मुझे जानते ह? जानना in the sense knowing who I really am. पता नहीं प्यार क्या होता है। क्या खून के रिश्तो के साथ जो लगाव होता है उसे प्यार कहते हैं? या फिर यह किसी अजनबी के साथ भी किया जा सकता है? पता नहीं पापा मम्मी  एक दूसरे से प्यार करते हैं कि भी नहीं? पर फिर सवाल मेरे दिमाग में यह भी आता है, कि इतने सालों से साथ कैसे रह रहे है? क्या शादी करना किसी से प्यार करना होता है? या फिर अगर आप किसी से प्यार करते हैं तो फिर आप उससे शादी भी करते हैं। और अगर शादी ना हो तो क्या वह प्यार नहीं था? तब कोई किसी से कहता है या कहती है कि, वह उससे प्यार करते हैं, तो इस बात से उनका क्या मतलब होता है? प्यार की असल परिभाषा क्या है?

कल कुछ बहुत अजीब हुआ। अट लीस्ट मुझे अजीब लगा। बुरा भी लगा।  मम्मी मुझसे पूछने आई की खाने में क्या खाओगी। तो मैंने झट से जवाब दिया ऊपमा खाऊंगी। मुझे उपमा बहुत पसंद है। करीब आधे घंटे में ऊपमा बन गया था। मम्मी ने मुझे आवाज लगाई कि आ कर अपनी प्लेट लेकर जाओ। जैसा कि  हर बार होता है। मैं उनके दो तीन बार आवाज लगाने के बाद ही रसोई में गई। बहुत सी बार तो मै इससे भी ज्यादा देर कर दिया करती हूं। इस बात पर मुझे बहुत डांट भी पड़ी है। जैसे ही मैं रसोई में पहुंची तो पता नहीं क्यों मेरी नजरें अपनी प्लेट को छोड़ दूसरी  प्लेटो पड़ी। हां मेरी प्लेट में ऊपमा इतना नहीं था, जितनी मुझे भूख लगी थी और ना ही वह उतना था जितना कि बाकी प्लेटो में था। यह बात बहुत छोटी है पर ना जाने क्यों उस दिन से मेरे दिमाग से उतर ही नहीं रही है। बार-बार मैं खुद से यही पूछ रही हूं कि आखिर ऐसा था क्यो?

How was your day?

It was good. What about you?

मेरा दिन भी चंगा था।

और इस तरह है मेरे हर दिन का अंत होता है। पर हर दिन चँगा नही होता। तब मैं करीब 10 साल की थी, एक अंकल हमारे घर आए थे। उन्होंने मुझसे बड़ी उत्सुकता से पूछा था कि बेटा तुम बड़ी होकर क्या बनना चाहती हो? मैं दौड़कर दूसरे कमरे में गई और अपने सारे के सारे खिलौने अंकल के सामने लाकर रख दिऐ और अपनी सारी बंदूको को दिखाते हुए, मैंने उनसे कहा कि मुझे सोल्जर बनना है। फिर मैंने उन्हें फायरिंग करने की एक्टिंग भी करके दिखाईं। आज से 9 महीने बाद Mera MBBS ka exam hai जिसे दे कर मुझे मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलेगा। सब बहुत टेंशन में है और मुझे उनकी टेंशन समझ ही नहीं आती। पढ़ना मुझे है,पेपर भी मुझे ही देना है। अगर सिलेक्शन होगा तो कॉलेज भी मैं ही जाऊंगी। फिर दूसरे इस बात से इतना परेशान क्यों है, कि आखिर होगा क्या? क्या यह प्यार है? जो वह मेरी परेशानी, मेरी टेंशन को भी अपना बना रहे हैं। या फिर बस यूं ही टेंशन लिए जा रहे है। may be ऐसा इसलिए हो  क्योंकि वे मुझसे प्यार करते हो। इसलिए मेरी परेशानी या मेरी टेंशन को भी अपना बना लेते हैं। पर फिर क्या उनका दुख और मेरा दुख या मेरी खुशी या उनकी खुशी एग्जाम में पास या फेल होने पर समान होगा? अगर नहीं तो फिर इस बात का हल क्या है? कई बार मुझे ऐसा लगता है कि मैं कुछ ज्यादा सोच रही हूं। पर क्या पता मैं सही सोच रही हूं। हम अपनी जिंदगी जिए जा रहे हैं, रिश्ते निभाए जा रहे हैं सही उस प्रकार से जैसा कि हमेशा से होते आया है। ऐसा मैंने महसूस किया है या फिर कह सकते हैं कि रोज करती हूं,कि अगर मैं एक जगह पर रुक जाऐ और हर चीज को क्वेश्चन करने लगे या फिर कुछ चीजों को क्वेश्चन करने लगे तो शायद बहुत सी चीजें तो हम बिना वजह कर रहे हैं। या फिर मेरे पास उनका उत्तर नहीं है।पर आजकल पता नहीं क्यों दिल और दिमाग में इन पहेलियों को सुलझाने की उत्सुकता जागी हुई है। मैं जानना चाहती हूं कि अगर कोई मुझसे नफरत करते हैं तो क्यों, प्यार करते हैं तो क्यों, क्या वह हमेशा प्यार करेंगे या फिर सिर्फ अपने मतलब के लिए प्यार कर रहे हैं। प्यार जैसी कोई चीज होती भी है कि नहीं, मुझे नही पता। उसकी परिभाषा तो सबकी अलग है। सब अलग इंटेंसिटी से प्यार करते हैं, अलग अलग तरीके से प्यार करते हैं,अलग अलग तरीके से प्रकट करते हैं। और प्यार भी तो सिर्फ एक प्रकार का नहीं है। आपका आपकी मां के साथ प्यार, आपका आपके भाई के साथ प्यार, आपका आपके पापा के साथ प्यार, आपका आपके दोस्तों के साथ प्यार और एक वो जो प्यार है। इनमें से प्यार है कौन? मां की कुर्बानी देने को ही प्यार कहा जाता है। यह तो प्यार नहीं। खुद की खुशियों को ignore करना या फिर मजबूरी में कुर्बानी देना क्योंकि मैं मां हूं, क्या इसे प्यार कह सकते है? मजे की बात तो यह है  की जो प्यार मेरा मेरे किसी भी रिश्ते के साथ आज से 10 साल या 5 साल पहले था वह आज वैसा नहीं है।

मैं चौथी क्लास में थी, जब मै नए स्कूल में गई थी। तू जो भी टीचर आती वह यह प्रश्न जरूर किया करती थी। इसे खुद को क्लास में introduce कराना कहते हैं।

My name is Sara. I am 12 years old. I live in Dwarka. My parents are working. My favourite subject is mathematics.

Ok, Sara so tell me who is your idol?

My father mam.

Could you tell us why?

Because he understands me ma’am.

Class clap for Sara.

यह सिलसिला दूसरे बच्चों के साथ भी चलता। और मैं अपने बेंच पर जाकर बैठ जाती। सबने अपने अपने आइडल अलग-अलग बताएं। किसी ने कोई कार्टून का नाम लिया, तो किस ने कोई फिल्मी हीरो का। सबके आंसर्स बहुत इंटरेस्टिंग थे पर मैं मोस्टली लोगों से वाकिफ नहीं थी। ना उनसे जो जवाब दे रहे थे ना उनसे जो उनके जवाब में थे। टीवी और इंटरनेट की दुनिया से मैं इतना वाकिफ नहीं थी। ना ही मैने उस समय बहुत बुक्स पढ़ती थी। पहली पुस्तक मैने नौवी कक्षा मे पडी थी। तो वो सारे नाम मुझे बहुत अजनबी से लगे। हैरत की बात यह है कि किसी ने सेम प्रश्न मुझसे किसी ने फिर पूछा और मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। मैंने इस प्रश्न के बारे में बहुत गौर से कम से कम एक रात तो सोचा ही होगा I don't know why but there was no name I could say. Maybe because I have realised or observed that people, feelings or situations never remain same. Calling somebody my idol would mean I will admire that person in anything and everything they do. But is it possible that somebody will do everything right or everything they do would seem right to me? The answer will be most probably No. ऐसा नहीं है कि वह सामने वाला इंसान बदलता है पर हम खुद भी बहुत बदलते हैं। शायद ऐसा ही कुछ मेरे साथ हो रहा है। सिर्फ एक बुक या एक सिचुएशन हमारी सोच को कुछ और ही बना देती है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा हुआ। मै अपने स्टेशन से करीब 15 मिनट दूर हूं। नजारा बहुत अलग है। केरला से दिल्ली तक का सफर बहुत ही अद्भुत होता है। हर 5 से 10 किलोमीटर बाद खिड़की से बाहर देखने पर कुछ अलग नजारा नजर आता है। कुछ ऐसा जो पहले वाले नजारे में नहीं था। और यूं ही, इसी रफ्तार स एक के बाद एक नजारे बदलते जाते हैं। मेरा शहर दिल्ली, दिल्ली तो बदलती हुई भी अपनी सी लगती है हवा कितनी भी प्रदूषित क्यों ना हो एक सुकून सा देती है। इस बार ट्रेन का यह सफर हर बार के सफर से कुछ अलग था। आज जो विचार मेरे दिमाग में थे वो 11 वीं कक्षा में एमबीबीएस की पढ़ाई करते टाइम से आ रहे थे। उन दिनो तब रात के 3:00 बजे घर में सब सो जाया करते थे और एक कमरे के दरवाजो को बंद करके मैं वो मोटी मोटी  किताबों में हर नुमरीकल सॉल्व को शिद्दत से solve करने की कोशिश कर रही होती थी। हालांकि कुछ सालों बाद भी मेरे पास इन प्रश्नों के जवाब नहीं है। पता नहीं किसी और के पास है कि नहीं। शायद इनके जवाब मिल जाए तो दिल को थोड़ा और दिमाग को बहुत ज्यादा सुकून मिलेगा, यह कहते हुए डॉक्टर सक्सेना अपने स्टेशन पर, अपना एक छोटा सा बस्ता लिए उतर गऐ। क्योंकि अब एक स्टेशन भाद मेरा स्टेशन आने वाला था। तो मैंने अपने बैग उठाए जूते पहने गले में मफलर डाला और अपनी स्टेशन के आने का इंतजार करने लगी। 5 मिनट बाद मेरा स्टेशन आया। सारा सामान लेकर मैं प्लेटफार्म पर उतरी। पास ही में एक बेंच खाली था वहां अपना सामान रखा और खुद भी तशरीफ़ रखी। प्लेटफॉर्म पर थोड़ी देर तक बहुत हल-चल रही, पर जैसे ही ट्रेन अगले सेशन के लिए रवाना हुई station par pin drop silence थी। इतने सन्नाटे में अपनी पसंदीदा बुक पढ़ने का मजा ही कुछ और है हर वह शब्द जो आप उस समय में पढ़ते हैं उसका असर काफी गहरा होता है और तो और पढ़ने की स्पीड भी बढ़ जाती है। मैं ऐसा मौका बिल्कुल नहीं गवाना चाहती थी। बस फिर कुछ 1 घंटा वहीं बैठ कर मैंने अपनी पुस्तक पढ़ी। जैसे ही मैं घर पहुंची तो मेरी नजर फिर से रसोई में रखी प्लेटस पर पड़ी। मम्मी ने आज फिर ऊपमा बनाया था।




Self-Reflective Process Essay


For quite a long time my writing talents included the speech I wrote on independence and republic day for the celebrations in my society. The speeches were more or less same for every year. The praise I got what I wrote kept me going for several years. Speaking was not a problem but writing what to speak, definitely was a major concern. It is not like speaking has never been a problem. I was able to overcome this by saying one linear quotations in my school assembly with the help of one of my teacher. Later I even wrote some of my own quotes. It was from there that I took baby steps in writing. For the girl who was terrible in English speaking and writing, it meant a great deal to be able to write and speak the one linear quotes. I don’t know how but then I was able to speak and write instantly. This fetched me a lot of attention and praise at the same time. It was a great deal for school students to be able to do so. However, English was not my first language, it was only because of the school environment that I was made so much comfortable with one particular language English.  It is quite funny and wired at the same time, that now I who was supper scared of even being spotted in the class to read a paragraph (obviously in English), writes, speaks and the funny part even mostly thinks in English. I am not exaggerating it while saying that my mind up till now has forced itself to think in English. Because clearly I was forced to do so for quite a long time in a very passive manner. I clearly remember the difference in how I was treated when I became fluent in English and when I was not. There is this thing about acceptance that associated with a particular language. In the process I have neglected other languages. In my semester in Ambedkar University I opted for the course lyrical past. It striked me hard that in how much aww I saw when I read languages other than English. Then again here I am in another course in my third semester named ways of reading, where not my language but my thought were given more attention. It is quite interesting that now I try to use more of other language than English. I can say with quite surety that thinking in different languages makes you feel like a completely different person. It somehow take you closer to the culture from where the language comes. This was the one most important thing I have genuinely gained from this course. It is because of this reason that I have attempted to write a fiction in Hindi for the end semester prompt. I don’t know who it has turned out to be, but definitely I would like to attempt a write up in a language other than English very soon.
The poetry part was the best time I had in class and the ceiling fan was the poem I liked the most. I always had this question in my mind, whether it is the write who writes such deep meanings consciously or is it the reader who finds out these meanings? Through the class in this course I am able to find the answer to my question. The answer became more clear when our own poems were discussed in class. My own poem and the poems of my classmate were discussed in the manner that I was able to find to meanings which my words were conveying. Through this I was able to figure out that how I have to use words more precisely and how my words could mean different to different people. This has brought a change in me, which I have not completely mastered obviously, that now I think before I write or think about after I write it. Previously I practised more of a spontaneous form of writing and then considered it the best work ever written. To explain what I experienced in the entire course I have tried to illustrate it with visual work. This is my first attempt in visual work. I so much wanted to attempt it at least for once, after I was introduced to it in a detailed manner in the classroom.


Comments

Popular Posts